रविवार, 15 अप्रैल 2012 | By: हिमांशु पन्त

बस यूँ ही निकल पड़ा था घर से

बस यूँ ही निकल पड़ा था घर से,
एक मनमौजी आवारा मन ले के,
बस देखता रहा सड़कों पे चलते हुए,
सड़क किनारे बैठी बूढी औरत,
न मालुम किसको ढूंढ रही थी,
कुछ गुम सा गया था शायद,
या शायद वो खुद गुम गयी थी,

बस यूँ ही निकल पड़ा था घर से,
एक मनमौजी आवारा मन ले के,
बस देखता रहा सड़कों पे चलते हुए,
कुछ जली लकड़ी के टुकड़े किनारे,
दो काली पड़ी ईटों के बीच पड़े थे,
शायद रोटियाँ बनी थी इस जगह,
या शायद रातों को हाथ सीके थे.

बस यूँ ही निकल पड़ा था घर से,
एक मनमौजी आवारा मन ले के,
बस देखता रहा सड़कों पे चलते हुए,
कुछ पुराने कपड़ों के चीथड़े देखे,
मैले से और भीगे हुए वो टुकड़े थे,
शायद कोई उनको फेंक गया था,
या शायद किसी ने रात में ओढ़े थे.

बस यूँ ही निकल पड़ा था घर से,
एक मनमौजी आवारा मन ले के,
बस देखता रहा सड़कों पे चलते हुए,
पगडण्डी पे फिर एक कुटिया देखी,
दरवाजे पे उसके एक खाट पड़ी थी,
शायद अन्दर कल जगह नहीं थी,
या शायद बूढ़े की खांसी बिगड़ी थी.

बस यूँ ही निकल पड़ा था घर से,
एक मनमौजी आवारा मन ले के,
बस देखता रहा सड़कों पे चलते हुए,
आगे फिर एक चौराहा सा आया,
किनारे उसके कुछ लाल पड़ा था,
शायद किसी ने पीक थी थुकी,
या शायद कल फिर खून बहा था.

बस यूँ ही निकल पड़ा था घर से,
एक मनमौजी आवारा मन ले के,
बस देखता रहा सड़कों पे चलते हुए,
एक वक़्त फिर मन कुछ बिदका,
वापस घर को अब लौट चला था,
शायद कुछ थकान सी थी लगी,
या शायद ये मन कुछ मचला था.

1 comments:

M VERMA ने कहा…

मनमौजी आवारा मन न जाने क्या क्या देख लेता है
बहुत सुन्दर

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