बुधवार, 7 अप्रैल 2010 | By: हिमांशु पन्त

खो चुका हूँ मै..

मधुशाला के प्यालों मे, बिखरे सपनों के टुकड़ों मे,
मय मे डूबा हुआ कहीं पे, बहुत तन्हा हो चुका हूँ मै,
हाँ आज खुद को खो चुका हूँ मै........

भीड़ मै भी अकेला सा, यादों मे डूबा हर पल,
ख्वाहिशों मे लुटा कहीं पे, बहुत रो चुका हूँ मै,
हाँ आज खुद को खो चुका हूँ मै........

कभी हँसते हुए दुनिया को हंसाता था संग मे,
आज गम के दरिया मे, हंसी को डुबो चुका हूँ मै,
हाँ आज खुद को खो चुका हूँ मै........

पुष्पों की सुगंध को, पंखुड़ियों की कोमलता को,
उपवन के रंगों को भूल के, काँटों को संजो चुका हूँ मै,
हाँ आज खुद को खो चुका हूँ मै.......

दिल खामोश है, दिमाग कुछ परेशां सा हर पल,
नींद आती नहीं अब, शायद बहुत सो चुका हूँ मै,
हाँ आज खुद को खो चुका हूँ मै........

5 comments:

just explore me ने कहा…

bahut khoob likhtey ho janaab !

सीमा सचदेव ने कहा…

इस पीडा का भी कोई पारावार नहीं

Shekhar kumawat ने कहा…

दिल खामोश है, दिमाग कुछ परेशां सा हर पल,
नींद आती नहीं अब, शायद बहुत सो चुका हूँ मै,
हाँ आज खुद को खो चुका हूँ मै........

शानदार
BADHAI IS KE LIYE AAP KO

SHAKHE KUMAWAT

http://kavyawani.blogspot.com/

arvind ने कहा…

नींद आती नहीं अब, शायद बहुत सो चुका हूँ मै....bahut sundar likhte hai aap.

Siddharth Garg ने कहा…

Great post. Check my website on hindi stories at afsaana
. Thanks!

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