बुधवार, 29 अगस्त 2012 | By: हिमांशु पन्त

यहाँ कोयले से अरबों की दावत हो चुकी है

लबों को सीने की तो अब आदत हो चुकी है,
पेट भरने की जुस्तजू सियासत हो चुकी है,
उन लोगों को क्या इल्जाम दें जो की गैर हैं,
यहाँ तो अपनों की ही खिलाफत हो चुकी है।

बेईमानी तो अपनों की इबादत हो चुकी है,
चूल्हा जलाना भी अब आफत हो चुकी है,
रसोई गैस के दामों को रोने वालों समझो,
यहाँ कोयले से अरबों की दावत हो चुकी है।

1 comments:

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत क्गूब .... अच्छा लपेटा है कोयले के दलालों को ....

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