सोमवार, 12 अप्रैल 2010 | By: हिमांशु पन्त

मन की उमंगें

कुछ बावरा सा ही होता है मन, चाहे जिस किसी का भी हो, बहुत सी उमंगें और सोचें उसमे फलांग मारती रहती हैं.. उन्ही मे से कुछ मचलती सी  भावनाओं को बस लिख भर दिया है....

मन करता कभी उडूं मै,
चल जाऊं उस बादल पे,
सहलाऊं धीरे से उसको,
दो बूँद जल की ले आऊं.

मन करता कभी उडूं मै,
छु लूं मै उन तारों को,
तोड़ के बस किसी एक को,
मुट्ठी मे बंद कर लाऊं.

मन करता कभी उडूं मै,
और जाऊं चाँद के पास,
उसको थोडा सा छु कर के,
उसकी ठंडक को पा जाऊं.

मन करता कभी उडूं मै,
जाऊं उस सूरज पे चढ़,
थोडा सा फूक के उसको,
बस कुछ ठंडा कर आऊं.

मन करता कभी उडूं मै,
पक्षियों के संग संग जाऊं,
सीखूं उनसे चहचहाना,
और कुछ तिनके भी ले आऊं.

मन करता कभी उडूं मै,
बारिश की तह तक जाऊं,
ऊपर से देखूं गिरता उनको,
और थोडा सा रंग मिलाऊं.

मन करता कभी उडूं मै,
हवा के संग बहता जाऊं,
दूर चलूँ फिर किसी देश मे,
और थोड़ी सी मिटटी भर लाऊं.


मन करता कभी उडूं मै,
 दूर कहीं आसमान मे,
और देखूं फिर दुनिया को,
फिर वहां से इक चित्र बनाऊं.

मन करता कभी उडूं मै,
 पर्वतों पे कहीं पहुँच के,
उन पे गोदुं कुछ मन का,
और सबको अपने गीत दिखाऊं.

8 comments:

दिलीप ने कहा…

bahut khoob likha...ek vyanga meri ore se...
man karta hun udu main...
insaan ki basti me jaaun...
thodi haivaniyat baantun...
fir kuch ghar jalaaun...

http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

परमजीत बाली ने कहा…

अपने मनोभावो को बहुत सुन्दर सब्द दिए हैं। बधाई।

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

Shekhar kumawat ने कहा…

http://kavyawani.blogspot.com/

BAHUT KHUB

SHEKHAR KUMAWAT

Udan Tashtari ने कहा…

सही कहा...कभी कभी ऐसा मन करता है..बहुत सही उकेरा.

Suman ने कहा…

nice

कविता रावत ने कहा…

मन करता कभी उडूं मै,
पर्वतों पे कहीं पहुँच के,
उन पे गोदुं कुछ मन का,
और सबको अपने गीत दिखाऊं.

'Mero man anant kahan sukh paayo
jaise udi jahaj ko panchhi puni jahan par aayo'
En panktiyon ko saakar karti aapne rachna bahut achhi lagi...
Bahut shubhkamnayne.

संजय भास्कर ने कहा…

ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है

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