शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010 | By: हिमांशु पन्त

पगला मानुष

कभी तन्हाई मे बैठ के सोचो.. क्या हम पगले नहीं हैं.. कभी कुछ तो कभी कुछ करते हैं... कोई निश्चितता तो है ही नहीं जीवन मे.. तो हम भी तो एक पगले मानुष ही हैं...

मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.

किस पल मे मै हंस बैठूं,
न जाने किस पल  रो जाऊं.
किस पल को न जाने जी लूं,
न जाने किस पल मर जाऊं.

मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.

कभी तो हो सकता हूँ सरल सा,
न जाने किस पल मै अड़ जाऊं.
कभी तो बह चलूँ पवन सा,
न जाने किस पल फंस जाऊं.

मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.

कभी तो लड़ बैठूं अजेय सा,
न जाने किस पल डर जाऊं.
कभी तो वीरों सा गरजूं मै,
न जाने किस पल सहम जाऊं.

मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.

चलता रहूँ कभी तो हर पल,
न जाने किस पल थक जाऊं.
कभी तो काँटों पे दौडूँ मै,
न जाने किस पल फूलों से कट जाऊं.

मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.

कभी तो हूँ उन्मुक्त गगन सा,
न जाने किस पल मिटटी बन जाऊं.
कभी तो हूँ मै विशाल सागर सा,
न जाने किस पल ओझल हो जाऊं.

मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.

उडूं कभी एक स्वछंद  पंछी सा,
कभी पिजरे मे बंध जाऊं.
कभी जगा दूं इस दुनिया को,
कभी जगा के खुद सो जाऊं.

मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.

सुख बांटू कभी जहां को,
कभी दुःख मे खुद खो जाऊं.
कभी अकेलों का साथी हूँ,
कभी भीड़ मे तन्हा हो जाऊं.

मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.

कभी तो बढ़ चलूँ समंदर सा,
कभी ताल सा थाम जाऊं,
कभी तो मै इन्द्रधनुष हूँ,
कभी अमावस सा बेरंग हो जाऊं,

मै तो एक पगला मानुष,
ना जाने किस पल क्या कर जाऊं.

मै भी तो हूँ तुम सब जैसा,
तुम भी पगले मै भी पगला,
मेरी तरह तुम भी अनजाने,
बस दिखाते हो खुद को सयाने.

तो आओ मेरे साथ मे गाओ,
दुनिया को तुम भी बतलाओ,
मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.

न जाने किस पल क्या कर जाऊं,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.

4 comments:

मनोज कुमार ने कहा…

अपने मन की सच्ची बातें कवि सीधे-सीधे अपने ही मुख से उत्तम पुरुष में कह रहा है और पाठक को इस तरह उन भावों के साथ तादातम्य अनुभव करने में बड़ी सुगमता होती है।

Udan Tashtari ने कहा…

यही पागलपन तो जीवनधारा है जो दीवानगी की हद तक ले जाती है और जीवन को जीने लायक बनाती है वरना तो कौन चाहेगा अगली साँस लेना.

एक उत्कृष्ट रचना..सीधे दिल से निकली. बढ़िया लिख रहे हो हिमान्शु! बधाई ले लो!! :)

हिमांशु पन्त ने कहा…

aashirwad banaye rakhiye... :)

निपुण पाण्डेय ने कहा…

भाई बहुत बहुत बधाइयाँ ......

मस्त लिख रहा है भाई तू ...एकदम जबरदस्त !...
:):)

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