बुधवार, 27 जुलाई 2011 | By: हिमांशु पन्त

हाँ जिंदगी पे इतराना अब छोड़ दिया है,

बड़े मासूम से थे बीते हुए वो भी दिन,
इश्क की गलियाँ और आवारा कदम,
उन गलियों में जाना अब छोड़ दिया है,
हाँ जिंदगी पे इतराना अब छोड़ दिया है,

वक़्त की सुइयों की कोई परवाह नहीं,
बेसिर पैर के सपनों की कोई थाह नहीं,
उन सपनों को सजाना अब छोड़ दिया है,
हाँ जिंदगी पे इतराना अब छोड़ दिया है.

वादे करने की वो बेवजह सी एक आदत,
दिखावे को संभाली हुई एक झूठी शराफत,
उन दिखावों को निभाना अब छोड़ दिया है,
हाँ जिंदगी पे इतराना अब छोड़ दिया है.

1 comments:

Siddharth Garg ने कहा…

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