शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010 | By: हिमांशु पन्त

हाँ आज फिर ये दिल रोया है

लो आज फिर याद आ बैठा,
की तू दूर है मुझसे कहीं,
इल्म था उसका जो खोया है,
हाँ आज फिर ये दिल रोया है.

भूलने की नकली कोशिश,
हंसी का नकाब ओढ़े चेहरा,
गम को बहुत मन मे ढोया है,
हाँ आज फिर ये दिल रोया है.

बिखरी हुई सी ढेरों आरजू,
टूटी सी हजारों ख्वाहिशें,
अब हर सपना तक तो सोया है,
हाँ आज फिर ये दिल रोया है.

लहूलुहान सा मेरा ये मन,
अचेत सा मेरा ये जीवन,
शायद वही  पाया जो बोया है,
हाँ आज फिर ये दिल रोया है.

खामोश सी चीखती तड़प है,
आंसू भी तो निकलते नहीं,
फूलों ने भी तो हमे चुभोया है,
हाँ आज फिर ये दिल रोया है.

1 comments:

परमजीत बाली ने कहा…

अपने मनोभावों को बहुत सुन्दर शब्द दिए हैं।बधाई स्वीकारें।

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