शनिवार, 1 मई 2010 | By: हिमांशु पन्त

थाम के मेरा हाथ

बस ऐसे ही कुछ सोचा... कहीं पे एक चित्र देखा तो मन मे बस ये ही बोल उठ पड़े... शायद एक स्त्री जो अपने प्रेम के लिए किसी भी हद तक जा सकती है किसी भी परेशानी का सामना कर सकती है... उसी के नाम मेरी ये रचना..


कभी किन्ही अनजानी राहों पे,
कभी ऊँची नीची चट्टानों पे,
अगर कभी मै डगमगा जाऊं,
थाम के मेरा हाथ सजन रे,
एक बार कहना मै तेरी हूँ.

समुन्दर की भयावह लहरों से,
आंधी के बलवान थपेड़ों से,
अगर कभी मै सहर जाऊं,
थाम के मेरा हाथ सजन रे,
एक बार कहना मै तेरी हूँ.

गर्मी की चाहे लाख तपिश हो,
या बारिश भी रौद्र रूप मे,
मै उनमे भी चल जाऊँगी,
थाम के मेरा हाथ सजन रे,
एक बार कहना मै तेरी हूँ.

ये जग चाहे लाख सताए,
दुनिया चाहे लाख डराए,
सब छोड़ मै तेरे संग आऊँगी,
थाम के मेरा हाथ सजन रे,
एक बार कहना मै तेरी हूँ.

चाहे जैसा भी सफ़र  हो,
चाहे जितनी कठिन डगर हो,
हर कदम तेरे साथ रखूंगी,
थाम के मेरा हाथ सजन रे,
एक बार कहना मै तेरी हूँ.

9 comments:

दिलीप ने कहा…

eeshwar kare jaldi hi aapko ye kehne wala mil jaaye....

हिमांशु पन्त ने कहा…

hahaha... aapki jubaan pe saraswati virajmaan ho.. yahi dua karunga ab toh.. :P

Udan Tashtari ने कहा…

नारी के समर्पण के उम्दा भाव:

ये जग चाहे लाख सताए,
दुनिया चाहे लाख डराए,
सब छोड़ मै तेरे संग आऊँगी,
थाम के मेरा हाथ सजन रे,
एक बार कहना मै तेरी हूँ.

बहुत सुन्दर.

संजय भास्कर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

pink_paliwal ने कहा…

hmmmmmmmmmm.nice one

हिमांशु पन्त ने कहा…

बहुत बहुत धन्यवाद्...

मनोज कुमार ने कहा…

चाहे जैसा भी सफ़र हो,
चाहे जितनी कठिन डगर हो,
हर कदम तेरे साथ रखूंगी,
थाम के मेरा हाथ सजन रे,
एक बार कहना मै तेरी हूँ
बहुत अच्छी कविता... बहुत अच्छे भाव!

Siddharth Garg ने कहा…

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Rajiv ने कहा…

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