बुधवार, 28 अप्रैल 2010 | By: हिमांशु पन्त

ख्वाहिश - एक और ग़जल

मुझे कुछ इस कदर नशा सा हो गया है ग़जल लिखने का की बस हाथ थमते ही नहीं... लीजिये पेश ए खिदमत है एक और ग़जल .. दिल के बेहद करीब.. :)

 
तुझ से मिलने की जब कभी भी ख्वाहिश की थी,

मजबूरियों ने तब कुछ रुकने की फरमाइश की थी.



इक दफा फिर से तेरी यादों ने रुलाया है मुझको,

रुक्सती के दिन भी तो अस्कों ने नुमाइश की थी.



अब भी तो सोचा करता हूँ अक्सर तेरे चेहरे को,

उस वक़्त भी तेरे इक दर्श की आजमाइश की थी.




मालुम था की तेरे दिल मे कोई जगह नहीं मेरी,

फिर भी सफ़र मे कुछ पल की गुंजाइश की थी.



आँखों मे अब तलक भी दिखता है अक्स तेरा,

तेरी नजरों ने मेरी आँखों मे ये जेबा'इश की थी.



तू ही बता कैसे छोडूं अब इस तन्हाई का साथ,

बिन तेरे इसके दम ही जीने की आराइश की थी.


कुछ कठिन लफ्जों के अर्थ:  


जेबा'इश - बसाना, स्थापित करना.
आराइश - सजावट

8 comments:

rajeevspoetry ने कहा…

अच्छी ग़ज़ल है.
मतला बहुत अच्छा लगा.

-Rajeev Bharol

वीनस केशरी ने कहा…

आपको इस पोस्ट के लिए एक मेल की है जरूर देखें

हिमांशु पन्त ने कहा…

tahe dil se aabhar... waqt dene ke liye..

निपुण पाण्डेय ने कहा…

बेहतरीन ही कहेंगे ज़नाब इसे तो .....आप तो छा गये हैं एकदम....

अमा हम तो आपको नाम भी सुझा दिए "ज़नाब हेमू लखनवी " साहब ....:):)

बस लिखते रहो यूँ ही एक से एक उम्दा ग़ज़ल.....और इस बार गौर करने वाली बात ये है कि हम जैसी आम जनता भी आपकी ग़ज़ल समझ सकती है आराम से और मज़े ले सकती है ...:):)

pink_paliwal ने कहा…

gud one..naam achha he hemu lakhnawi

हिमांशु पन्त ने कहा…

शुक्रिया नामकरण के लिए..

राकेश कौशिक ने कहा…

तू ही बता कैसे छोडूं अब इस तन्हाई का साथ,
बिन तेरे इसके दम ही जीने की आराइश की थी.
बहुत खूब

शोभित जैन ने कहा…

तुझ से मिलने की जब कभी भी ख्वाहिश की थी,

मजबूरियों ने तब कुछ रुकने की फरमाइश की थी....

लाजबाब ....बेहतरीन ...खूबसूरत

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