कुछ बावरा सा ही होता है मन, चाहे जिस किसी का भी हो, बहुत सी उमंगें और सोचें उसमे फलांग मारती रहती हैं.. उन्ही मे से कुछ मचलती सी भावनाओं को बस लिख भर दिया है....
मन करता कभी उडूं मै,
चल जाऊं उस बादल पे,
सहलाऊं धीरे से उसको,
दो बूँद जल की ले आऊं.
मन करता कभी उडूं मै,
छु लूं मै उन तारों को,
तोड़ के बस किसी एक को,
मुट्ठी मे बंद कर लाऊं.
मन करता कभी उडूं मै,
और जाऊं चाँद के पास,
उसको थोडा सा छु कर के,
उसकी ठंडक को पा जाऊं.
मन करता कभी उडूं मै,
जाऊं उस सूरज पे चढ़,
थोडा सा फूक के उसको,
बस कुछ ठंडा कर आऊं.
मन करता कभी उडूं मै,
पक्षियों के संग संग जाऊं,
सीखूं उनसे चहचहाना,
और कुछ तिनके भी ले आऊं.
मन करता कभी उडूं मै,
बारिश की तह तक जाऊं,
ऊपर से देखूं गिरता उनको,
और थोडा सा रंग मिलाऊं.
मन करता कभी उडूं मै,
हवा के संग बहता जाऊं,
दूर चलूँ फिर किसी देश मे,
और थोड़ी सी मिटटी भर लाऊं.
मन करता कभी उडूं मै,
दूर कहीं आसमान मे,
और देखूं फिर दुनिया को,
फिर वहां से इक चित्र बनाऊं.
मन करता कभी उडूं मै,
पर्वतों पे कहीं पहुँच के,
उन पे गोदुं कुछ मन का,
और सबको अपने गीत दिखाऊं.
Pages
शुरुवात से ही एक स्वछंद पक्षी की भांति जीता रहा हूँ. कुछ लिखना चाहता था हमेशा से, अब क्यूँ है मन में ये, तो इसका भी जवाब है मेरे पास.. बहुत इच्छाएं आशाएं करी, पर सभी तो पूरी नहीं होती और कुछ हो भी जाती हैं, तो वही आधी अधूरी और कुछ पूरी इच्छाओं की खुशी या कष्ट को कहाँ पे कैसे व्यक्त करता, तो बस उठा ली कलम कुछ साल पहले,गोदा और फाड़ा, लिखता था तो मन में भावना आती थी की किसी को पढ़ाऊं, जिसको बोलता वो नाख भौं निचोड़ के आगे बढ़ चलता.. तकनीक का सहारा लेने लगा, तो अब आपके सामने हूँ..
कुल पेज दृश्य
Voice Of Heart
फ़ॉलोअर
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ऊपर वाला
मजहब ... कुछ स्वार्थी लोगों ने इस शब्द को कुछ इत्ता डरवाना बना दिया है की मजहब और धर्म का नाम कुछ खून का सा पर्याय बन गया है.. तो उन्ही भावनाओं को की किस तरह से हमारे घरों मे छोटे बच्चों को क्या सिखाया जा रहा है और इतनी गहनता के साथ बच्चे उसे सीख रहे हैं, मैंने इस रचना मे डाला है..
एक दिन उसको पिता ने बोला,
बेटा तेरे अन्दर बसते हैं भगवां,
खेलने को निकला बाहर दुनिया मे,
मिला एक मोहम्मद से कहीं पे,
बोला पता है तेरे अन्दर हैं भगवां,
मोहम्मद बोला हट तुझे नहीं पता,
मेरे अन्दर तो रहता है मेरा खुदा,
बस झगड़ पड़े दोनों बिन सोचे,
तब छोटा डेविड भी आया कहीं से,
पुछा अरे दोस्तों क्यूँ झगड़ते हो,
दोनों बोले बता तेरे अन्दर कौन,
डेविड बोला अन्दर तो ईसा बसता,
तो वो झगडा था एक मासूम सा,
पर था उनका पहला मजहब का,
मै गुजर बैठा तभी उधर से,
लड़ते देखा तो पुछा क्यूँ लड़ते हो,
बोले बताओ अन्दर कौन है बसता,
मैंने कहा देखो हम सब इन्सां,
न कोई हिन्दू न कोई मुसल्मां,
हमारे अन्दर एक ही रचयिता,
चाहे कह लो उसे खुदा या ईसा,
मानो तो बस एक ही रहनुमा,
मै तो कहता उसे ऊपर वाला,
उस पल बच्चे दिए मुस्कुरा,
जैसे कह रहे हों मुझको पगला...
बोला पता है तेरे अन्दर हैं भगवां,
मोहम्मद बोला हट तुझे नहीं पता,
मेरे अन्दर तो रहता है मेरा खुदा,
बस झगड़ पड़े दोनों बिन सोचे,
तब छोटा डेविड भी आया कहीं से,
पुछा अरे दोस्तों क्यूँ झगड़ते हो,
दोनों बोले बता तेरे अन्दर कौन,
डेविड बोला अन्दर तो ईसा बसता,
तो वो झगडा था एक मासूम सा,
पर था उनका पहला मजहब का,
मै गुजर बैठा तभी उधर से,
लड़ते देखा तो पुछा क्यूँ लड़ते हो,
बोले बताओ अन्दर कौन है बसता,
मैंने कहा देखो हम सब इन्सां,
न कोई हिन्दू न कोई मुसल्मां,
हमारे अन्दर एक ही रचयिता,
चाहे कह लो उसे खुदा या ईसा,
मानो तो बस एक ही रहनुमा,
मै तो कहता उसे ऊपर वाला,
उस पल बच्चे दिए मुस्कुरा,
जैसे कह रहे हों मुझको पगला...
पगला मानुष
कभी तन्हाई मे बैठ के सोचो.. क्या हम पगले नहीं हैं.. कभी कुछ तो कभी कुछ करते हैं... कोई निश्चितता तो है ही नहीं जीवन मे.. तो हम भी तो एक पगले मानुष ही हैं...
मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.
किस पल मे मै हंस बैठूं,
न जाने किस पल रो जाऊं.
किस पल को न जाने जी लूं,
न जाने किस पल मर जाऊं.
मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.
कभी तो हो सकता हूँ सरल सा,
न जाने किस पल मै अड़ जाऊं.
कभी तो बह चलूँ पवन सा,
न जाने किस पल फंस जाऊं.
मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.
कभी तो लड़ बैठूं अजेय सा,
न जाने किस पल डर जाऊं.
कभी तो वीरों सा गरजूं मै,
न जाने किस पल सहम जाऊं.
मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.
चलता रहूँ कभी तो हर पल,
न जाने किस पल थक जाऊं.
कभी तो काँटों पे दौडूँ मै,
न जाने किस पल फूलों से कट जाऊं.
मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.
कभी तो हूँ उन्मुक्त गगन सा,
न जाने किस पल मिटटी बन जाऊं.
कभी तो हूँ मै विशाल सागर सा,
न जाने किस पल ओझल हो जाऊं.
मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.
उडूं कभी एक स्वछंद पंछी सा,
कभी पिजरे मे बंध जाऊं.
कभी जगा दूं इस दुनिया को,
कभी जगा के खुद सो जाऊं.
मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.
सुख बांटू कभी जहां को,
कभी दुःख मे खुद खो जाऊं.
कभी अकेलों का साथी हूँ,
कभी भीड़ मे तन्हा हो जाऊं.
मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.
कभी तो बढ़ चलूँ समंदर सा,
कभी ताल सा थाम जाऊं,
कभी तो मै इन्द्रधनुष हूँ,
कभी अमावस सा बेरंग हो जाऊं,
मै तो एक पगला मानुष,
ना जाने किस पल क्या कर जाऊं.
मै भी तो हूँ तुम सब जैसा,
तुम भी पगले मै भी पगला,
मेरी तरह तुम भी अनजाने,
बस दिखाते हो खुद को सयाने.
तो आओ मेरे साथ मे गाओ,
दुनिया को तुम भी बतलाओ,
मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.
न जाने किस पल क्या कर जाऊं,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.
मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.
किस पल मे मै हंस बैठूं,
न जाने किस पल रो जाऊं.
किस पल को न जाने जी लूं,
न जाने किस पल मर जाऊं.
मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.
कभी तो हो सकता हूँ सरल सा,
न जाने किस पल मै अड़ जाऊं.
कभी तो बह चलूँ पवन सा,
न जाने किस पल फंस जाऊं.
मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.
कभी तो लड़ बैठूं अजेय सा,
न जाने किस पल डर जाऊं.
कभी तो वीरों सा गरजूं मै,
न जाने किस पल सहम जाऊं.
मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.
चलता रहूँ कभी तो हर पल,
न जाने किस पल थक जाऊं.
कभी तो काँटों पे दौडूँ मै,
न जाने किस पल फूलों से कट जाऊं.
मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.
कभी तो हूँ उन्मुक्त गगन सा,
न जाने किस पल मिटटी बन जाऊं.
कभी तो हूँ मै विशाल सागर सा,
न जाने किस पल ओझल हो जाऊं.
मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.
उडूं कभी एक स्वछंद पंछी सा,
कभी पिजरे मे बंध जाऊं.
कभी जगा दूं इस दुनिया को,
कभी जगा के खुद सो जाऊं.
मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.
सुख बांटू कभी जहां को,
कभी दुःख मे खुद खो जाऊं.
कभी अकेलों का साथी हूँ,
कभी भीड़ मे तन्हा हो जाऊं.
मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.
कभी तो बढ़ चलूँ समंदर सा,
कभी ताल सा थाम जाऊं,
कभी तो मै इन्द्रधनुष हूँ,
कभी अमावस सा बेरंग हो जाऊं,
मै तो एक पगला मानुष,
ना जाने किस पल क्या कर जाऊं.
मै भी तो हूँ तुम सब जैसा,
तुम भी पगले मै भी पगला,
मेरी तरह तुम भी अनजाने,
बस दिखाते हो खुद को सयाने.
तो आओ मेरे साथ मे गाओ,
दुनिया को तुम भी बतलाओ,
मै तो एक पगला मानुष,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.
न जाने किस पल क्या कर जाऊं,
न जाने किस पल क्या कर जाऊं.
आज भी उतना ही जीता हूँ मै
जिंदगी कुछ तो बदल जाती है आपके सपनों के टूटने के बाद.. आप जीते तो हो पर वो बात नहीं रह जाती.. सपने तोड़ने वाले को आपका डर रहता है,पर इस बात का नहीं की आपका क्या होगा, इस बात का की आपको कुछ हो गया तो उसको कितनी आत्मग्लानी होगी..
दिल मे चोटें भी हैं, मन मे कई मर्म भी,
इन सब घावों को, तेरी यादों से सीता हूँ मै,
पर तू मत घबरा, आज भी उतना ही जीता हूँ मै....
मय पहले भी पीता था, आज भी प्याले छलकते हैं,
लेकिन पहले खुशियों थी, आज गम मे पीता हूँ मै,
पर तू मत घबरा, आज भी उतना ही जीता हूँ मै....
रोता तो तब भी था, पर वो दर्द दर्द न देते थे,
अब दर्दों का तो पता नहीं, पर वेदनाओं की सरिता हूँ मै,
पर तू मत घबरा, आज भी उतना ही जीता हूँ मै....
जीवन के पृष्ठों पे, हजारों सपनों के किस्से थे,
सपने तो बह गए, अब एक दर्द भरी कविता हूँ मै,
पर तू मत घबरा, आज भी उतना ही जीता हूँ मै....
मेरी फिकर नहीं तुझको, डर है अपने अंतर्मन की,
मत डर चोटिल ही सही, आज भी वही चीता हूँ मै,
तो तू मत घबरा, आज भी उतना ही जीता हूँ मै....
दिल मे चोटें भी हैं, मन मे कई मर्म भी,
इन सब घावों को, तेरी यादों से सीता हूँ मै,
पर तू मत घबरा, आज भी उतना ही जीता हूँ मै....
मय पहले भी पीता था, आज भी प्याले छलकते हैं,
लेकिन पहले खुशियों थी, आज गम मे पीता हूँ मै,
पर तू मत घबरा, आज भी उतना ही जीता हूँ मै....
रोता तो तब भी था, पर वो दर्द दर्द न देते थे,
अब दर्दों का तो पता नहीं, पर वेदनाओं की सरिता हूँ मै,
पर तू मत घबरा, आज भी उतना ही जीता हूँ मै....
जीवन के पृष्ठों पे, हजारों सपनों के किस्से थे,
सपने तो बह गए, अब एक दर्द भरी कविता हूँ मै,
पर तू मत घबरा, आज भी उतना ही जीता हूँ मै....
मेरी फिकर नहीं तुझको, डर है अपने अंतर्मन की,
मत डर चोटिल ही सही, आज भी वही चीता हूँ मै,
तो तू मत घबरा, आज भी उतना ही जीता हूँ मै....
क्यूँ बोलूं.
खामोशियों मे कभी चीखने का मन होता है बहुत, पर फिर मन सोचने लगता है की क्या फायदा चीख के.. लोग मिलते हैं तो पूरे मन की व्यथाएं, खुशियाँ सब कुछ बोल देने का मन करता है.. पर फिर सोचता हूँ की आखिर क्या बोलूं और क्यूँ बोलूं... तो इस रचना मे जो दो पंक्तियाँ लिखी हैं हर भाग मे, उनका अर्थ मेरे लिए तो बहुत बड़ा और गहरा है.. आशा है की आप भी उसे पकड़ लोगे...
जीवन की कठिन राहों पे,
सफ़र तो अकेले ही करना है,
फिर क्या बोलूं मैं क्यूँ बोलूं.
यादें तो आनी ही हैं,
उनमे ही जीवन कटना है,
फिर क्या बोलूं मे क्यूँ बोलूं.
चिंतन करने की क्यूँ सोचूं,
होनी को तो होना है,
फिर क्या बोलूं मैं क्यूँ बोलूं.
कर्तव्यों की आढ़ मैं,
वादों को तो टूटना है,
फिर क्या बोलूं मैं क्यूँ बोलूं.
सपने तो दिखते ही हैं,
पर रिश्तों को भी तो जीना है,
फिर क्या बोलूं मैं क्यूँ बोलूं.
ख्वाहिशें तो काम है चेतन का,
और उसको तो वो करना है,
फिर क्या बोलूं मैं क्यूँ बोलूं.
जीवन सिर्फ जीता ही तो नहीं,
एक दिन तो उसको भी मरना है,
फिर क्या बोलूं मैं क्यूँ बोलूं.
गलतियां तो हुई है बहुत सी,
पर पीछे जाना तो होगा नहीं,
फिर क्या बोलूं मे क्यूँ बोलूं.
खामोश भी रहा नहीं जाता,
पर दर्दों को भी कोई सुनता नहीं,
फिर क्या बोलूं मैं क्यूँ बोलूं......
जीवन की कठिन राहों पे,
सफ़र तो अकेले ही करना है,
फिर क्या बोलूं मैं क्यूँ बोलूं.
यादें तो आनी ही हैं,
उनमे ही जीवन कटना है,
फिर क्या बोलूं मे क्यूँ बोलूं.
चिंतन करने की क्यूँ सोचूं,
होनी को तो होना है,
फिर क्या बोलूं मैं क्यूँ बोलूं.
कर्तव्यों की आढ़ मैं,
वादों को तो टूटना है,
फिर क्या बोलूं मैं क्यूँ बोलूं.
सपने तो दिखते ही हैं,
पर रिश्तों को भी तो जीना है,
फिर क्या बोलूं मैं क्यूँ बोलूं.
ख्वाहिशें तो काम है चेतन का,
और उसको तो वो करना है,
फिर क्या बोलूं मैं क्यूँ बोलूं.
जीवन सिर्फ जीता ही तो नहीं,
एक दिन तो उसको भी मरना है,
फिर क्या बोलूं मैं क्यूँ बोलूं.
गलतियां तो हुई है बहुत सी,
पर पीछे जाना तो होगा नहीं,
फिर क्या बोलूं मे क्यूँ बोलूं.
खामोश भी रहा नहीं जाता,
पर दर्दों को भी कोई सुनता नहीं,
फिर क्या बोलूं मैं क्यूँ बोलूं......
खो चुका हूँ मै..
मधुशाला के प्यालों मे, बिखरे सपनों के टुकड़ों मे,
मय मे डूबा हुआ कहीं पे, बहुत तन्हा हो चुका हूँ मै,
हाँ आज खुद को खो चुका हूँ मै........
भीड़ मै भी अकेला सा, यादों मे डूबा हर पल,
ख्वाहिशों मे लुटा कहीं पे, बहुत रो चुका हूँ मै,
हाँ आज खुद को खो चुका हूँ मै........
कभी हँसते हुए दुनिया को हंसाता था संग मे,
आज गम के दरिया मे, हंसी को डुबो चुका हूँ मै,
हाँ आज खुद को खो चुका हूँ मै........
पुष्पों की सुगंध को, पंखुड़ियों की कोमलता को,
उपवन के रंगों को भूल के, काँटों को संजो चुका हूँ मै,
हाँ आज खुद को खो चुका हूँ मै.......
दिल खामोश है, दिमाग कुछ परेशां सा हर पल,
नींद आती नहीं अब, शायद बहुत सो चुका हूँ मै,
हाँ आज खुद को खो चुका हूँ मै........
मय मे डूबा हुआ कहीं पे, बहुत तन्हा हो चुका हूँ मै,
हाँ आज खुद को खो चुका हूँ मै........
भीड़ मै भी अकेला सा, यादों मे डूबा हर पल,
ख्वाहिशों मे लुटा कहीं पे, बहुत रो चुका हूँ मै,
हाँ आज खुद को खो चुका हूँ मै........
कभी हँसते हुए दुनिया को हंसाता था संग मे,
आज गम के दरिया मे, हंसी को डुबो चुका हूँ मै,
हाँ आज खुद को खो चुका हूँ मै........
पुष्पों की सुगंध को, पंखुड़ियों की कोमलता को,
उपवन के रंगों को भूल के, काँटों को संजो चुका हूँ मै,
हाँ आज खुद को खो चुका हूँ मै.......
दिल खामोश है, दिमाग कुछ परेशां सा हर पल,
नींद आती नहीं अब, शायद बहुत सो चुका हूँ मै,
हाँ आज खुद को खो चुका हूँ मै........
पराई सड़क..
एक एहसास है मेरे मन का, किसी एक रास्ते को खो देने का दर्द, वो रास्ता जिससे गुजरने मे कभी मुझे दिन भर की खुशियाँ एक पल मे ही मिल जाती थी.. पर आज वो ही सड़क पता नहीं क्यूँ एकदम अजनबी सी है... कदम तो अब भी उधर मुड़ते हैं पर एक अजीब से डर के साथ.. डर उस सड़क के खो जाने का.. उस सड़क की छाँव के खो जाने का.. मंजिल मे न पहुँच पाने का...
मन मे एक मायूसी सी आज फिर छाई है,
हाँ मुझे एहसास है की वो सड़क अब पराई है.
चलता था किसी भी राह पे, कदम खुद मुड़ जाते थे,
उसकी गलियों से गुजरने को, बहाने हर पल बनाते थे.
पर आज उन राहों पे सिर्फ और सिर्फ तन्हाई है,
हाँ मुझे एहसास है की वो सड़क अब पराई है.
दिख जाये बस झलक उसकी, आरजू हमेशा होती थी,
चेहरा जिधर भी होता, नजरें उसको कभी न खोती थी,
पर आज आँखों पे सिर्फ उसकी अधूरी परछाई है,
हाँ मुझे एहसास है की वो सड़क अब पराई है.
बहुत दूर जा चुकी वो, पर अक्स अब भी मेरे पास है,
यादों को भुला भी दूं, तो मन मे उसका एहसास है,
पर उसको सोचने मे भी तो अब खुद की ही रुसवाई है,
हाँ मुझे एहसास है की वो सड़क अब पराई है.
आज भी गुजरता हूँ उन्ही राहों से, तलाशते हुए उसको,
थक सा गया हूँ बेरुखी से, दर्द देता हूँ अब खुद को,
पर खो चुका हूँ उसे मै अब यही मेरी सच्चाई है,
हाँ मुझे एहसास है की वो सड़क अब पराई है.
इस राह के आखिर मे सिर्फ एक अँधेरी खाई है,
हाँ मुझे एहसास है की वो सड़क अब पराई है.
मन मे एक मायूसी सी आज फिर छाई है,
हाँ मुझे एहसास है की वो सड़क अब पराई है.
चलता था किसी भी राह पे, कदम खुद मुड़ जाते थे,
उसकी गलियों से गुजरने को, बहाने हर पल बनाते थे.
पर आज उन राहों पे सिर्फ और सिर्फ तन्हाई है,
हाँ मुझे एहसास है की वो सड़क अब पराई है.
दिख जाये बस झलक उसकी, आरजू हमेशा होती थी,
चेहरा जिधर भी होता, नजरें उसको कभी न खोती थी,
पर आज आँखों पे सिर्फ उसकी अधूरी परछाई है,
हाँ मुझे एहसास है की वो सड़क अब पराई है.
बहुत दूर जा चुकी वो, पर अक्स अब भी मेरे पास है,
यादों को भुला भी दूं, तो मन मे उसका एहसास है,
पर उसको सोचने मे भी तो अब खुद की ही रुसवाई है,
हाँ मुझे एहसास है की वो सड़क अब पराई है.
आज भी गुजरता हूँ उन्ही राहों से, तलाशते हुए उसको,
थक सा गया हूँ बेरुखी से, दर्द देता हूँ अब खुद को,
पर खो चुका हूँ उसे मै अब यही मेरी सच्चाई है,
हाँ मुझे एहसास है की वो सड़क अब पराई है.
इस राह के आखिर मे सिर्फ एक अँधेरी खाई है,
हाँ मुझे एहसास है की वो सड़क अब पराई है.
खडंजा..
क्या आपको याद हैं वो दिन जब ये चमकती डामर की सड़कों के बदले वो उबड़ खाबड़ खडंजे हुआ करते थे... जिंदगी कुछ अलग सी हुआ करती थी... तो यहाँ पे मैंने कुछ पुरानी जिंदगी को खडंजे से जोड़ते हुए नयी जिंदगी से तुलना करने का एक छोटा सा प्रयास किया है...
ईंट पत्थर से बना, धुल मिटटी सी सना,
फिर भी अच्छा सा लगता था वो खडंजा,
उबड़ खाबड़ सा, और कहीं पे कुछ समतल सा,
डगमगा के कहीं हलके से संभलता था खडंजा.
किनारे पे चूरन की दुकान,और इमली का ठेला,
कुछ कड़वा और खट्टा सा भी लगता था खडंजा.
ठन्डे पानी का वो मटका छाँव पे पेड़ के नीचे कहीं,
आत्मा को तृप्ति मन को शांत करता था खडंजा.
आज पता नहीं कहाँ खो गया है वो रास्ता,
चमकती सी सड़क दिखती तो है समतल सी,
सुनी सी जिंदगी शांत सी चलने लगी है,
मगर चमकती हुई सी कुछ चुभती है सड़क.
वो खट्टी कडवी राहें भी दिखती नहीं,
वो मटके भी कहीं मशीन मे बदले से दिखते हैं,
बस चलते से जाते हैं कदम बिना हलचल के,
मुझको तो अब भी याद आता है बस वो खडंजा....
ईंट पत्थर से बना, धुल मिटटी सी सना,
फिर भी अच्छा सा लगता था वो खडंजा,
उबड़ खाबड़ सा, और कहीं पे कुछ समतल सा,
डगमगा के कहीं हलके से संभलता था खडंजा.
किनारे पे चूरन की दुकान,और इमली का ठेला,
कुछ कड़वा और खट्टा सा भी लगता था खडंजा.
ठन्डे पानी का वो मटका छाँव पे पेड़ के नीचे कहीं,
आत्मा को तृप्ति मन को शांत करता था खडंजा.
आज पता नहीं कहाँ खो गया है वो रास्ता,
चमकती सी सड़क दिखती तो है समतल सी,
सुनी सी जिंदगी शांत सी चलने लगी है,
मगर चमकती हुई सी कुछ चुभती है सड़क.
वो खट्टी कडवी राहें भी दिखती नहीं,
वो मटके भी कहीं मशीन मे बदले से दिखते हैं,
बस चलते से जाते हैं कदम बिना हलचल के,
मुझको तो अब भी याद आता है बस वो खडंजा....
मेरी मजबूरी...
कुछ मर्म सा है मेरे मन मे कुछ छुट सा जाने का, या कुछ खो जाने का, शायद आपको मेरी पुरानी रचनाओं मे भी इसकी काफी झलक दिखी होगी और आगे भी दिखती रहेगी.. कुछ है जो हमेशा कचोटता है अन्दर से.....
न जाने क्यूँ मे खुद को पहचान नहीं पाता,
गम को तो छुपा भी लेता हूँ कभी कभी,
पर इस मन की वेदना को छुपा नहीं पाता.
न जाने क्यूँ खुद को पथीक कहला नहीं पाता,
मंजिल तो पहचान भी लेता हूँ कभी कभी,
पर रास्तों को कभी पहचान नहीं पाता.
न जाने क्यूँ तेरी यादों को भुला नहीं पाता,
तेरा सच तो पहचान भी लेता हूँ कभी कभी,
पर उन वादों को कभी पहचान नहीं पाता.
न जाने क्यूँ इन इच्छाओं को दबा नहीं पाता,
चेतन को तो समझा भी लेता हूँ कभी कभी,
पर इस नासमझ चित्त को मना नहीं पाता,
न जाने क्यूँ इश्क अब किसी से कर नहीं पाता,
दिल को तो अब लगा भी लेता हूँ कभी कभी,
पर तेरी यादों को अब भी मैं भूला नहीं पाता.
न जाने क्यूँ मे खुद को पहचान नहीं पाता,
गम को तो छुपा भी लेता हूँ कभी कभी,
पर इस मन की वेदना को छुपा नहीं पाता.
न जाने क्यूँ खुद को पथीक कहला नहीं पाता,
मंजिल तो पहचान भी लेता हूँ कभी कभी,
पर रास्तों को कभी पहचान नहीं पाता.
न जाने क्यूँ तेरी यादों को भुला नहीं पाता,
तेरा सच तो पहचान भी लेता हूँ कभी कभी,
पर उन वादों को कभी पहचान नहीं पाता.
न जाने क्यूँ इन इच्छाओं को दबा नहीं पाता,
चेतन को तो समझा भी लेता हूँ कभी कभी,
पर इस नासमझ चित्त को मना नहीं पाता,
न जाने क्यूँ इश्क अब किसी से कर नहीं पाता,
दिल को तो अब लगा भी लेता हूँ कभी कभी,
पर तेरी यादों को अब भी मैं भूला नहीं पाता.
वो आवारगी..
दिन भर के ऑफिस के थकान भरे काम काज के बाद कभी जब घर आ के लेटता हूँ बिस्तर पे.. तो अपनी अधूरी ख्वाहिशों के सपनों के पीछे दौड़ने लगता हूँ.. इसी दौड़ पे कभी कभी उन दर्द भरी ख्वाहिशों को फांद के और पीछे चला जाता हूँ तो याद आता है अपना वो लड़कपन.. एक वो समय जब मेरा अपना कोई अस्तित्व महसूस ही नहीं होता था मुझे, जब मै पता नहीं कौन हुआ करता था.. बेफिक्र सा, शुन्य सा मन लिए बस अपने आवारा क़दमों के दम पे पूरी जिंदगी, आवारा दिल के दम पे मनचाहे प्यार को पाने की इच्छाएं रखता था.. दोस्त थे साथ मे कुछ, जिनसे झगडे ही ज्यादा होते थे... पर अब भीड़ के साथ मे जो अकेलापन महसूस होता है उसमे उन सबकी बहुत याद आती है... उस वक़्त लगता है काश की कभी वो दिन लौट पाते...
क्या अब कभी लौट सकते हैं मेरे वो दिन..
बस देख के कुछ जलन सी होती है कभी,
हँसते से सड़कों पर चिल्लाते चेहरे देख के,
बेफिक्र आवारा से बस दौड़ते से वो कदम,
धुल मिटटी से सने बडबडाते हुए से हरदम.
बेपरवाह चाय के ठेलों पे चुस्कियां लेते,
कुछ अजीब बातों पे बहस सी करते हुए,
पल मे दोस्ती और अगले पल लड़ते हुए,
दिन की धुप मे भी छाँव की परवाह नहीं,
पसीने मे भीगते दुनिया को घुम जाना.
कॉलेज से भाग के तीन पत्ती का वो खेल,
घर आ के थका सा बिस्तर पे लेट जाना,
माँ का गर्म खाना देना प्यार से उस पल,
और उस पे मेरा कुछ नखरा सा दिखाना,
याद अब भी आता है माँ के हाथ से खाना,
घनी धुप मे निकल जाना दोस्तों के साथ,
धुल भरी सडकें और गलियों को फांकना,
उस समोसे को हरी चटनी के साथ खाना,
चाय संग अपनी प्रेम कहानी दोस्त को सुनाना,
खाली वक़्त दो लाइन की शायरी लिख इतराना,
हाँ मैंने भी जिया है वो अपना लड़कपन दीवाना,
कभी किसी लड़की को देख के किसी सड़क पे,
दो दिन तक उन्ही रास्तों पे मंडराते रहते थे,
प्यार तो हमको भी रोज हुआ करता था,
और रोज ही बेचारा दिल टूटा करता था,
पैदल ना जाने कितने ही दूर निकल जाया करते थे,
जिंदगी तो चार क़दमों से ही नाप लेंगे लगता था,
हाँ हमने भी जी है वो आवारा लापरवाह जिंदगी,
पर आज न वो दिन हैं न ही वो बेफिक्र जिंदगी,
जाने कहाँ खो गया है वो खामोश हलचल भरा वक़्त,
हाँ मे लौटना चाहता हूँ आज फिर से वहीँ पे कहीं,
क्यूँ नहीं ये जिंदगी और कुछ छोटी सी होती है,
और उन्ही दिनों पे आ के कहीं रुक नहीं जाती,
बार बार मन से कहीं ये वेदना सी निकलती है,
क्या आज अब कभी लौट सकते हैं मेरे वो दिन.........
क्या अब कभी लौट सकते हैं मेरे वो दिन..
बस देख के कुछ जलन सी होती है कभी,
हँसते से सड़कों पर चिल्लाते चेहरे देख के,
बेफिक्र आवारा से बस दौड़ते से वो कदम,
धुल मिटटी से सने बडबडाते हुए से हरदम.
बेपरवाह चाय के ठेलों पे चुस्कियां लेते,
कुछ अजीब बातों पे बहस सी करते हुए,
पल मे दोस्ती और अगले पल लड़ते हुए,
दिन की धुप मे भी छाँव की परवाह नहीं,
पसीने मे भीगते दुनिया को घुम जाना.
कॉलेज से भाग के तीन पत्ती का वो खेल,
घर आ के थका सा बिस्तर पे लेट जाना,
माँ का गर्म खाना देना प्यार से उस पल,
और उस पे मेरा कुछ नखरा सा दिखाना,
याद अब भी आता है माँ के हाथ से खाना,
घनी धुप मे निकल जाना दोस्तों के साथ,
धुल भरी सडकें और गलियों को फांकना,
उस समोसे को हरी चटनी के साथ खाना,
चाय संग अपनी प्रेम कहानी दोस्त को सुनाना,
खाली वक़्त दो लाइन की शायरी लिख इतराना,
हाँ मैंने भी जिया है वो अपना लड़कपन दीवाना,
कभी किसी लड़की को देख के किसी सड़क पे,
दो दिन तक उन्ही रास्तों पे मंडराते रहते थे,
प्यार तो हमको भी रोज हुआ करता था,
और रोज ही बेचारा दिल टूटा करता था,
पैदल ना जाने कितने ही दूर निकल जाया करते थे,
जिंदगी तो चार क़दमों से ही नाप लेंगे लगता था,
हाँ हमने भी जी है वो आवारा लापरवाह जिंदगी,
पर आज न वो दिन हैं न ही वो बेफिक्र जिंदगी,
जाने कहाँ खो गया है वो खामोश हलचल भरा वक़्त,
हाँ मे लौटना चाहता हूँ आज फिर से वहीँ पे कहीं,
क्यूँ नहीं ये जिंदगी और कुछ छोटी सी होती है,
और उन्ही दिनों पे आ के कहीं रुक नहीं जाती,
बार बार मन से कहीं ये वेदना सी निकलती है,
क्या आज अब कभी लौट सकते हैं मेरे वो दिन.........
चक्रव्यूह - एक उलझन जहन की...
पुष्प की सुगंध को सराहूं या उसकी सुन्दरता की तारीफ़ करूं..
न जाने भ्रमर को क्या लुभाता है हर एक पुष्प पे मंडराने को..
अचेत भ्रमित सा है कुछ मेरा ये अंतर्मन क्या वो भ्रमर ही है..
जो पुष्प को गर्वित होते हुए इठलाने का अवसर दिया करता है..
या पुष्प है जो भ्रमर को जीने का एक अलग नजरिया देता है..
या नहीं शायद दोनों ही एक दुसरे के बिना कुछ अधूरे से हैं..
बिना पुष्प भ्रमर की दीवानगी का कहाँ किसी को पता चलता..
भ्रमर न होता तो पुष्प की सुन्दरता का व्यख्यान कौन करता..
शायद यही प्रक्रति है किसी भी जीवनपंथी की और जीवन की..
जीवन पंथी के बिना अधुरा है पंथी जीवन के बिना कुछ नहीं..
फिर भी न जाने क्यूँ हर एक जीवन एक पुष्प की तरह है..
और चलने वाला जीवनपंथी एक भ्रमर का कुछ द्योतक सा है..
न जाने क्यूँ पंथी ही हर घड़ी जीवन के पास ही मंडराता है..
बिना सोचे की उसके बिना तो जीवन का कोई महत्व ही नहीं..
कुछ अजीब सा चक्रव्यूह सजा है पुष्प और जीवन दोनों ही का..
भ्रमर भी फंसा है उसमे और पंथी भी पूर्णतयः उलझा सा हुआ..
इस जाल से छुट सा जाने का एक भय सा है इन दोनों में ही..
पुष्प और जीवन दोनों ही अट्टहास करते होंगे शायद इन पे..
फिर भी प्रफुल्लित हैं भ्रमर और पंथी बिना खुद की पहचान के..
जानते हुए की उस मृत्यु के पल सिर्फ तन्हाई ही साथ में होगी..
न जाने भ्रमर को क्या लुभाता है हर एक पुष्प पे मंडराने को..
अचेत भ्रमित सा है कुछ मेरा ये अंतर्मन क्या वो भ्रमर ही है..
जो पुष्प को गर्वित होते हुए इठलाने का अवसर दिया करता है..
या पुष्प है जो भ्रमर को जीने का एक अलग नजरिया देता है..
या नहीं शायद दोनों ही एक दुसरे के बिना कुछ अधूरे से हैं..
बिना पुष्प भ्रमर की दीवानगी का कहाँ किसी को पता चलता..
भ्रमर न होता तो पुष्प की सुन्दरता का व्यख्यान कौन करता..
शायद यही प्रक्रति है किसी भी जीवनपंथी की और जीवन की..
जीवन पंथी के बिना अधुरा है पंथी जीवन के बिना कुछ नहीं..
फिर भी न जाने क्यूँ हर एक जीवन एक पुष्प की तरह है..
और चलने वाला जीवनपंथी एक भ्रमर का कुछ द्योतक सा है..
न जाने क्यूँ पंथी ही हर घड़ी जीवन के पास ही मंडराता है..
बिना सोचे की उसके बिना तो जीवन का कोई महत्व ही नहीं..
कुछ अजीब सा चक्रव्यूह सजा है पुष्प और जीवन दोनों ही का..
भ्रमर भी फंसा है उसमे और पंथी भी पूर्णतयः उलझा सा हुआ..
इस जाल से छुट सा जाने का एक भय सा है इन दोनों में ही..
पुष्प और जीवन दोनों ही अट्टहास करते होंगे शायद इन पे..
फिर भी प्रफुल्लित हैं भ्रमर और पंथी बिना खुद की पहचान के..
जानते हुए की उस मृत्यु के पल सिर्फ तन्हाई ही साथ में होगी..
कुछ उम्मीदें
उस दिन को कोसूं या फिर आज खुद को दोष दूं,
सोचा ही नहीं था की कुछ गलत सोच लिया था,
जाने क्या था पर इश्क तो तुझसे कर ही लिया था.
सपनों पे यकीं था पर इस कदर करना था की नहीं,
इस पर तो शायद कभी गौर ही नहीं कर पाए हम,
पता नहीं क्यूँ हर सपना तो तुझको दे ही दिया था.
उम्मीदें तुझसे भी हमे करनी थी या की शायद नहीं,
बस वादे ही करते रह गया उस तमाम वक़्त तेरे साथ,
पर उम्मीदों के साए में तुझको भी तो रख ही लिया था.
वक़्त माँगा था तुझसे या शायद वो भूल थी मेरी ही,
तेरे इनकार को बस मजाक ही समझते रह गए हम,
पर वक़्त के इंतेजार मे तुझको तो रख ही लिया था.
किस्मत पे भरोसा था ना जाने क्यूँ आखिर तक,
कुछ भरोसा तेरा भी हमेशा मेरे साथ था कहीं पे,
पर भरोसे की आड़ मे खुद को तो ठग ही लिया था....
सोचा ही नहीं था की कुछ गलत सोच लिया था,
जाने क्या था पर इश्क तो तुझसे कर ही लिया था.
सपनों पे यकीं था पर इस कदर करना था की नहीं,
इस पर तो शायद कभी गौर ही नहीं कर पाए हम,
पता नहीं क्यूँ हर सपना तो तुझको दे ही दिया था.
उम्मीदें तुझसे भी हमे करनी थी या की शायद नहीं,
बस वादे ही करते रह गया उस तमाम वक़्त तेरे साथ,
पर उम्मीदों के साए में तुझको भी तो रख ही लिया था.
वक़्त माँगा था तुझसे या शायद वो भूल थी मेरी ही,
तेरे इनकार को बस मजाक ही समझते रह गए हम,
पर वक़्त के इंतेजार मे तुझको तो रख ही लिया था.
किस्मत पे भरोसा था ना जाने क्यूँ आखिर तक,
कुछ भरोसा तेरा भी हमेशा मेरे साथ था कहीं पे,
पर भरोसे की आड़ मे खुद को तो ठग ही लिया था....
तलाश मंजिल की
मन की बहुत गहराइयों मे उतर के और ढेर सारा दर्द महसूस करते हुए ये कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं.. जाहिर है की दिल की गहराइयों से निकली हैं तो दिल के और मेरे जीवन के बहुत ही करीब भी होंगी... ये पंक्तियाँ लिख के शायद मे अपने दर्द को कहीं न कहीं आपसे बांटना चाहता हूँ.. कितना सफल हुआ हूँ इसका फैसला तो पढने वाला ही कर पायेगा.. पर ये वो पंक्तियाँ हैं जिनमे मुझे अपने मन की एक बहुत बड़ी कसक निकालने का मौका मिला है.. ये वो पंक्तियाँ हैं जहाँ पे मुझे किसी बहुत ही करीबी चीज को या आरजू को खोने की एक पीड़ा को व्यक्त करने का अवसर मिला है...
बढ़ना तो शुरु कर दिया, मंजिल की तलाश में, वो मंजिल जो सामने ही थी कहीं..
राह तो कुछ कठिन थी, मुश्किलों से सफ़र कुछ आसां किया तो खुद मंजिल ही धोखा दे गयी.
शिकायत भी करी कहीं पे तो खुद ही रुसवा हो गए, शायद गलतियाँ हमने भी की थी कहीं..
खुद को जब कुछ समझ आया, तो वक़्त ही न बचा था वक़्त माँगा तो घडी ही धोखा दे गयी..
सामने दिखती है वो अब भी, पर उस मंजिल पे किसी और की दस्तक दिखने लगी है अब तो..
उस दस्तक को चुप करके हराना चाहा तो जरुर, पर हमारी खुद की दस्तक हमे धोखा दे गयी..
कुछ वादे तो उसने भी किये थे हमसे, एक आस बाकी थी उन्ही वादों की जहन में कहीं..
सोचा की उसकी याद ही साथ दे देगी शायद, पर कम्भक्त उसकी याद भी हमे धोखा दे गयी..
खामोशियों के सिवा कुछ बचा न था अब, तो सोचा भीड़ बन के ही उसके करीब आ जायें कहीं..
कोशिश तो की थी जरुर हिस्सा बनने की, पर किस्मत का क्या कहिये वो भीड़ भी कम्भक्त धोखा दे गयी..
चलो तनहाइयों में खो के कहीं किसी दूसरी मजिल को तलाशें, सोच के आगे हम भी बढ़ चले..
दूसरी मंजिलें भी मिली बड़ी ही आसानी से, मगर इस बार पुरानी मंजिल की चाह धोखा दे गयी..
बढ़ना तो शुरु कर दिया, मंजिल की तलाश में, वो मंजिल जो सामने ही थी कहीं..
राह तो कुछ कठिन थी, मुश्किलों से सफ़र कुछ आसां किया तो खुद मंजिल ही धोखा दे गयी.
शिकायत भी करी कहीं पे तो खुद ही रुसवा हो गए, शायद गलतियाँ हमने भी की थी कहीं..
खुद को जब कुछ समझ आया, तो वक़्त ही न बचा था वक़्त माँगा तो घडी ही धोखा दे गयी..
सामने दिखती है वो अब भी, पर उस मंजिल पे किसी और की दस्तक दिखने लगी है अब तो..
उस दस्तक को चुप करके हराना चाहा तो जरुर, पर हमारी खुद की दस्तक हमे धोखा दे गयी..
कुछ वादे तो उसने भी किये थे हमसे, एक आस बाकी थी उन्ही वादों की जहन में कहीं..
सोचा की उसकी याद ही साथ दे देगी शायद, पर कम्भक्त उसकी याद भी हमे धोखा दे गयी..
खामोशियों के सिवा कुछ बचा न था अब, तो सोचा भीड़ बन के ही उसके करीब आ जायें कहीं..
कोशिश तो की थी जरुर हिस्सा बनने की, पर किस्मत का क्या कहिये वो भीड़ भी कम्भक्त धोखा दे गयी..
चलो तनहाइयों में खो के कहीं किसी दूसरी मजिल को तलाशें, सोच के आगे हम भी बढ़ चले..
दूसरी मंजिलें भी मिली बड़ी ही आसानी से, मगर इस बार पुरानी मंजिल की चाह धोखा दे गयी..
जीवनपथ
मेरे मन मे सदा से जीवन को ले के अजीब से विचार और फिर कुछ प्रश्न घूमते रहते हैं... उन्ही को कुछ पंक्तिबद्ध करने की कोशिश है मेरी ये रचना...
जीवनपथ पर बस चलता ही रहा,
जो पथ दिखा बस मुड़ता ही रहा,
कभी सोचा ही नही की कौन हूँ में,
आखिर कहाँ क्या अस्तित्व है मेरा,
की मै भी तो उसी भीड़ का हिस्सा हूँ,
जिसे मै अक्सर खुद भीड़ कहता हूँ,
की मेरे भी तो वही सब कर्तव्य हैं,
जिनको मै अक्सर भीड़ में ढूंढता हूँ,
पर क्या में वो हूँ जो तुम्हे देखना चाहता हूँ ?
नही मै वो नही मै तो बस खुद को छलता हूँ
बस तुम मे अपने मन चाहा देखना चाहता हूँ,
ख़ुद मे झांके बिना तुम मे सब ढूँढना चाहता हूँ.
क्या मै वो हूँ जो वास्तव में होना चाहता हूँ,
क्या मै सही जी रहा हूँ, या बस जी रहा हूँ,
बस एक निरुत्तर पंथी की तरह चल रहा हूँ.
जीवनपथ पर बस चलता ही रहा,
जो पथ दिखा बस मुड़ता ही रहा,
कभी सोचा ही नही की कौन हूँ में,
आखिर कहाँ क्या अस्तित्व है मेरा,
की मै भी तो उसी भीड़ का हिस्सा हूँ,
जिसे मै अक्सर खुद भीड़ कहता हूँ,
की मेरे भी तो वही सब कर्तव्य हैं,
जिनको मै अक्सर भीड़ में ढूंढता हूँ,
पर क्या में वो हूँ जो तुम्हे देखना चाहता हूँ ?
नही मै वो नही मै तो बस खुद को छलता हूँ
बस तुम मे अपने मन चाहा देखना चाहता हूँ,
ख़ुद मे झांके बिना तुम मे सब ढूँढना चाहता हूँ.
क्या मै वो हूँ जो वास्तव में होना चाहता हूँ,
क्या मै सही जी रहा हूँ, या बस जी रहा हूँ,
बस एक निरुत्तर पंथी की तरह चल रहा हूँ.
बंजारा जीवन..
जिंदगी से ख़ुशी की तलाश में घूमता एक बंजारा हूँ मै,
खुशियाँ हैं तो बहुत जिंदगी में फ़िर भी कम लगती हैं.
वो कहते हैं की क्यूँ देखते हो सपने जागती आंखों से,
पर आंखों में इतने सपने हैं की जिंदगी भी कम लगती है.
रात का इंतज़ार तो अब होता नही इस बेसब्र दिल को,
इसलिए जागती आंखों में ही सपनों को ढो लिया करते हैं.
वैसे ये जिंदगी छोटी तो नही अगर हर पल को जिया जाए,
मगर कट जाता है हर पल इसी सोच में की अगले पल क्या किया जाए...
खुशियाँ हैं तो बहुत जिंदगी में फ़िर भी कम लगती हैं.
वो कहते हैं की क्यूँ देखते हो सपने जागती आंखों से,
पर आंखों में इतने सपने हैं की जिंदगी भी कम लगती है.
रात का इंतज़ार तो अब होता नही इस बेसब्र दिल को,
इसलिए जागती आंखों में ही सपनों को ढो लिया करते हैं.
वैसे ये जिंदगी छोटी तो नही अगर हर पल को जिया जाए,
मगर कट जाता है हर पल इसी सोच में की अगले पल क्या किया जाए...
पापा..
माँ तो हमेशा से हमारे देश क्या पूरे विश्व मे एक महान दर्जा रखती है.. पर पाता नहीं क्यूँ कभी पिता को शायद हम बहुत प्यार तो करते हैं और इज्जत भी देते हैं.. पर दिखा नहीं पाते.. तो बस उन्ही पिताओं के लिए समर्पित है मेरी एक ये रचना...
वो एक शख्स जो हमेशा तकलीफें झेलता है,
अपनी आरजुओं को हमारी इच्छाओं पे कुर्बान करता है,
फिर भी न जाने क्यूँ उसका नाम कोई नही लेता,
जिंदगी पूरी अपने परिवार के लिए जो जीता है,
दर्द में और गम में भी वो हमारी खुशियों को देखता है,
ख़ुद को हो जितनी तक्लिफ्फ़ पर हमे सारे आराम जो देता है,
फिर भी न जाने क्यूँ उसका नाम कोई नही लेता,
जो अपनी पूरी जिंदगी हमारे नाम कर देता है,
जिसे कुछ नही बस हमारी कामयाबी से प्यार है,
हमारी जिंदगी के लिए जो कुछ भी करने को तैयार है,
हमे ऊंचाई पे देखने के लिए जो हर पल बेकरार है,
ए पिता तुझको मेरी तरफ़ से हर बेटे का नमन और प्यार है....
वो एक शख्स जो हमेशा तकलीफें झेलता है,
अपनी आरजुओं को हमारी इच्छाओं पे कुर्बान करता है,
फिर भी न जाने क्यूँ उसका नाम कोई नही लेता,
जिंदगी पूरी अपने परिवार के लिए जो जीता है,
दर्द में और गम में भी वो हमारी खुशियों को देखता है,
ख़ुद को हो जितनी तक्लिफ्फ़ पर हमे सारे आराम जो देता है,
फिर भी न जाने क्यूँ उसका नाम कोई नही लेता,
जो अपनी पूरी जिंदगी हमारे नाम कर देता है,
जिसे कुछ नही बस हमारी कामयाबी से प्यार है,
हमारी जिंदगी के लिए जो कुछ भी करने को तैयार है,
हमे ऊंचाई पे देखने के लिए जो हर पल बेकरार है,
ए पिता तुझको मेरी तरफ़ से हर बेटे का नमन और प्यार है....
एक अनोखी मोहब्बत
तकरीबन ६ साल पहले शायद १२ अगस्त की ही तारीख थी, रेडियो पे एक उदघोसना सुनी की १५ अगस्त को देश को समर्पित कुछ रचनाएं आमंत्रित हैं श्रोताओं से.. बस लिखने का तो शौक था ही पर कुछ उट पटांग सा ही लिखा था अब तक.. तो सोचा क्यूँ न मे भी भेजूं कुछ लिख के.. बस क्या था उठा ली अपनी डाइरी, और भावनाएं जो देश के प्रति उस समय तक उड़ेल सकता था उड़ेल दी.. और साइबर कैफे मे जा के एक इ-मेल कर दिया उस रेडियो वाले एड्रेस पे.. बस क्या था मे शायद बता नहीं सकता कितना हर्ष अनुभव किया था मैंने जब रेडियो मे चुनी हुई ३ रचनाओं मे मेरी रचना को सर्वोतम घोषित किया गया.. बस उसके बाद तो एक के बाद एक कई रचनायें कर डाली...तो यही है मेरी वो कविता जिसने कहीं न कहीं मुझे आगे लिखने को प्रोत्साहित किया....
एक अनोखी मोहब्बत का नज़ारा हमें देखने को मिला,
जमीं पे लहू से लिखा हुआ प्रेम पत्र पढने को मिला.
इस मोहब्बत में कीमती तोहफे नही सिर्फ़ जान दी गई,
इस खेल में दुश्मनों पर बंदूकें तान दी गई.
महबूबा तो एक थी ,मगर आशिक अनेक थे,
सब अलग-२ होते हुए भी इस प्यार के खेल में एक थे.
हर आशिक एक दूसरे की जान बचाना चाहता था,
मरे या जिए हर आशिक इस खेल में सफल माना जाता था.
ये मोहब्बत एक अनोखी मोहब्बत थी,
जिसमे आशिक था फौजी और महबूबा मात्रभूमि थी.
इस खेल को देख हर देशवासी का जी भर आता ,
इसे देख बच्चा बच्चा भी कह उठता जय जवान , जय भारत माता.
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- हिमांशु पन्त
- मैं एक वो इंसान हूँ जो जिंदगी को खेलते हुए जीना चाहता है और ऐसे ही जीवन की सभी दुविधाओं को ख़तम करना चाहता है... मतलब की मै कुछ जिंदगी को आसां बनाना चाहता हूँ.. वास्तव मै मै अपने सपनों और इच्छाओं मे और उनके साथ जीना चाहता हूँ.. मैं अपने भाग्यचक्र को हराना चाहता हूँ पर ये भी सच है की मे भाग्यचक्र के साथ चलना भी चाहता हूँ.. शायद मे कुछ उलझा हुआ सा हूँ अपने मे.. तो बस आप मेरे मित्र बन के रहो और साथ ही इस उलझन का एक हिस्सा भी... तो मुस्कुराते रहो और अपनी जिंदगी को जिन्दा रखो... वादा है मुश्किलें आसां हो जाएँगी... :)