बुधवार, 5 मई 2010 | By: हिमांशु पन्त

फिर एक कविता.....

कविता पे एक कविता..... क्या क्या लिख जाते हैं हम लोग कविता मे... या कविता होती कैसी है..... या कैसे बनती है... वही लिख दिया.... फिर एक कविता.....


उन दर्दों को फिर आज सुनाने का दिल करता है,
आज फिर एक कविता लिख जाने को दिल करता है.

बारिश की बूदें हों या वो बिजली की चमक,
बस फिर कुछ कह जाने को दिल करता है.
बादलों की गडगडाहट हवा की सरसराहट,
इन सबको आज आजमाने को दिल करता है.

इस मौसम को बस गुनगुनाने को दिल करता है,
आज फिर एक कविता लिख जाने को दिल करता है.

वक़्त की सुइयों को और रिश्ते की डोरों को,
फिर से जग को समझाने को दिल करता है.
सारी भूली यादों को उन अनकहे जज्बातों को,
एक बार फ़िर से जी जाने को दिल करता है.

आंसु को आज फ़िर स्याही बनाने को दिल करता है,
आज फ़िर एक कविता लिख जाने को दिल करता है.

9 comments:

दिलीप ने कहा…

lajawaab...jis jis cheez ka dilkare kalam se likh dijiye...

हिमांशु पन्त ने कहा…

aur wahi kavita hai.. :)

Ra ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Ra ने कहा…

jyada kuchh nahi kahunga ......bas hamare man ki baat aapki kalam se kavita ban guzari hai ...shaandaar prastuti ..badhaai swekaare

http://athaah.blogspot.com/

सु-मन (Suman Kapoor) ने कहा…

आज तन्हा हो जाने को दिल करता है
फिर कविता लिख लेने को दिल करता है...............

Udan Tashtari ने कहा…

क्या बात है, हिमान्शु..बहुत खूब!

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना|

Nipun Pandey ने कहा…

आज फिर एक कविता लिख जाने को दिल करता है.

वाह वाह!
आज फिर एक कविता लिख जाने को दिल करता है.

बहुत सुन्दर रचना दोस्त ! कविता पर तो इतना लिखा जा सकता है की कभी खत्म ही ना हो क्युकी कविता लिखना तो कभी रुक सकता नही ! मन के भाव खत्म होते नही और फिर यही होता है आज फिर एक कविता लिख जाने को दिल करता है.

kjdhgsj ने कहा…

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