मंगलवार, 4 मई 2010 | By: हिमांशु पन्त

एक दफा फिर

लीजिये फिर से आ गया मे अपने नए नए बने शौक को ले के.. हाँ जी पेश-ए-खिदमत है एक और ग़जल... एक दफा फिर..




एक दफा फिर हमे अपनों ने लूटा है,

एक दफा फिर आज ये दिल टूटा है.


दिल पे बहुत किया यकीं अब तक,

अब पता चला की ये दिल झूठा है.


कल तलक सोचा था उन को अपना,

आज फिर उसने मेरा सपना लूटा है.


याद भी उसे कर आखिर क्या करना,

अब तलक कहाँ उसने हमे पूछा है.


मैकदे मे इस ढब गुम चुका यारों,

जैसे पूरा जिस्म मदहोशी मे डूबा है.


वक़्त इस कदर हमसे खफा सा है,

लग रहा मेरा अक्स मुझसे रूठा है.

5 comments:

दिलीप ने कहा…

achcha shauk hai dheere dheere katilana likhne lagenge...shubhkamnayein...gazal badhiya hai...

मनोज कुमार ने कहा…

लाजवाब‍!

निपुण पाण्डेय ने कहा…

मैकदे मे इस ढब गुम चुका यारों,

जैसे पूरा जिस्म मदहोशी मे डूबा है.

वाह मदहोश शायर ! बेहतरीन ....भाई मैं तो आश्चर्यचकित हूँ तेरी ये छुपी हुई प्रतिभा देख कर .....चलो देर सबेर आपने अपनी प्रतिभा को देखने का मौका दिया .....यूँ ही लिखते रहो
शुभकामनाएं ...:)

Siddharth Garg ने कहा…

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Rajiv ने कहा…

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