सोमवार, 3 मई 2010 | By: हिमांशु पन्त

बेलगाम वक़्त

सभी को पता है की वक़्त तो बस भागता ही है.. और किसी के रोके रुकता नहीं फिर भी एक कोशिश रहती है कई बार वक़्त पे विजय पाने की तो उसी कोशिश को अभिव्यक्त कर दिया है इस रचना मे....

कोशिश करता और फिर थकता हूँ,
हर पल थामने को लगा रहता हूँ,
पर मेरी उम्मीदों से ज्यादा सख्त,
छूटता जा रहा है ये बेलगाम वक़्त.

बचपन मे भी इसको पकड़ना चाहा,
जवानी मे भी इसको जकड़ना चाहा,
पर हमेशा से दिल मे डालता लख्त,
छूटता जा रहा है ये बेलगाम वक़्त.

गाँव मे कुछ ठहरा सा दिख जाता,
पर शहरों मे बस भागता सा जाता,
न जाने कैसा सफ़र करता कम्भक्त,
छूटता जा रहा है ये बेलगाम वक़्त.

वादों की ना है कुछ परवाह इसको,
ना ही कसमों से रहे कुछ मतलब,
बस अपने धुन मे चले है मदमस्त,
छूटता जा रहा है ये बेलगाम वक़्त.

एक उलझन है मन मे इसको ले के,
जीवन बढाता या घटाता इसका संग,
साथ मे तो बहा ले जाता है हर रक्त,
छूटता जा रहा है ये बेलगाम वक़्त.

अति बलवान और कभी अति जटिल,
कभी चपल रहे और कभी शिथिल,
हर युग हर वेश मे ये रहता सशक्त,
छूटता जा रहा है ये बेलगाम वक़्त.

7 comments:

राजेन्द्र मीणा 'नटखट' ने कहा…

एक सुन्दर रचना......सच के बहुत ही करीब ...पढ़ कर अच्छा लगा ........सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई

अति बलवान और कभी अति जटिल,
कभी चपल रहे और कभी शिथिल,
हर युग हर वेश मे ये रहता सशक्त,
छूटता जा रहा है ये बेलगाम वक़्त

waakai great

राजेन्द्र मीणा 'नटखट' ने कहा…

http://athaah.blogspot.com/

pink_paliwal ने कहा…

kya baat he din prati din teri likhawat me nipunta aa rahi he. gud one

Amitraghat ने कहा…

बहुत बढ़िया लिखा है सरल शब्दों में गहरी बात।

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

सुमन'मीत' ने कहा…

हर पल हाथों से फिसलता वक्त
बहुत सुन्दर..........

निपुण पाण्डेय ने कहा…

छूटता जा रहा है ये बेलगाम वक़्त.

वाह वाह !

बस इस एक पंक्ति ने ही मन मोह लिया दोस्त ....

और वक़्त की इस बेलगामी को जीवन के हर पहलू में जिस खूबसूरती से तूने समझाया है इस रचना में वो काबिले तारीफ है ....... भाई बस इसी तरह लिखते रहना ...कुछ खास है इस लेखनी में ..... बहुत कुछ निकलेगा इस लेखनी से अभी ....शुभकामनाएं !

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